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यूपी के भरम में फंसा देश

युवा संवाद - अप्रैल 2019 अंक में प्रकाशित

उत्तर प्रदेश देश को भ्रमित करेगा या स्पष्ट दिशा देगा? यह सवाल भारतीय राजनीति के पंडितों को परेशान किए हुए हैं। परेशान भाजपा भी है जिसने 2014 में प्रदेश से 73 सीटें लेकर ढाई दशक पुरानी अल्पमत सरकारों की परंपरा को तोड़ दिया था। हालांकि भाजपा ने एनडीए नाम से गठबंधन सरकार ही चलाई लेकिन उसे स्पष्ट बहुमत हासिल था। दूसरी ओर परेशान कांग्रेस पार्टी भी है जिसका प्रदेश में आधार लगातार खत्म होता चला गया है लेकिन वह नरेंद्र मोदी सरकार की तमाम कमियों को सबसे आक्रामक तरीके से उजागर करके 2009 की उपलब्धि दोहरा कर सत्ता में लौटना चाहती है। कांग्रेस ने इस महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अध्यक्ष राहुल गांधी ही नहीं उनकी छोटी बहन प्रियंका गांधी को भी मैदान में उतार दिया है। वह सोच रही है कि छवियों की इस राजनीति में लोग उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखने लगेंगे। कांग्रेस के इस सपने को भाजपा से तो चुनौती मिल ही रही है लेकिन सर्वाधिक चुनौती अगर किसी से मिल रही है तो वह सपा और बसपा के गठबंधन से। चाणक्य की यह उक्ति हर जगह लागू नहीं होती कि शत्रु का शत्रु मित्र होता है। कई बार वह भी शत्रु ही होता है। अगर ऐसा न होता तो विभिन्न राज्यों के अनुभव से ऊबी मायावती कांग्रेस के साथ उत्तर प्रदेश में किसी भी तरह का गठबंधन करने के विरुद्ध वीटो न लगा देतीं और कांग्रेस की ओर से सपा-बसपा और रालोद के प्रमुख नेताओं के लिए सात सीटें छोड़े जाने को सद्भावना की बजाय भ्रम फैलाने की राजनीति न कहतीं। मायावती को अपने दलित यानी अनुसूचित जाति के वोटों के कांग्रेस के पास लौट जाने का डर है। मायावती भीम सेना के नेता चंद्रशेखर आजाद का अस्पताल में हाल चाल लेने प्रियंका गांधी के जाने और जंतर मंतर की रैली में कांशीराम की बहन स्वर्ण सिंह के आने से चिढ़ी भी हैं।

 

यह सही है कि कई बार उत्तर प्रदेश दिल्ली की सरकार के लिए निर्णायक फैसला देता है लेकिन कई बार वह भ्रम भी पैदा करता है। 2014 में अगर उसने निर्णायक फैसला दिया था तो 2004 और 2009 में भ्रम पैदा किया था। इसलिए प्रदेश की नब्ज पर हाथ रखने वाले कुछ भी कह पाने की स्थिति में नहीं हैं। वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय उपस्थिति और उत्तर प्रदेश से जुड़े उनके प्रतिनिधित्व के असर को खारिज नहीं कर पा रहे हैं। उनका मानना है कि पुलवामा के आतंकी हमले और बदले में बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक का असर जरूर पड़ेगा। अगर अयोध्या में मंदिर निर्माण नहीं शुरू हो पाया तो क्या हुआ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रयागराज (इलाहाबाद) में अर्धकुंभ को कुंभ बनाकर पेश तो कर दिया। उन्होंने हिंदू समाज को फिर तीर्थों और मठों से बांध दिया है और वह छिटक कर किसी और के पास जाएगा ही नहीं।

 

दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जिनका मानना है कि उत्तर प्रदेश ने भाजपा को जितनी बड़ी जीत दी थी उसका पार्टी ने उपहास किया है। प्रदेश के औद्योगिक विकास की रफ्तार ठहर गई है, किसानों की फसलों को छुट्टा जानवरों और नोटबंदी ने और व्यापारियों को जीएसटी में तबाह कर दिया है और नई नौकरियां पैदा नहीं हुई हैं। इसलिए जनता फिर जातियों में बंटेगी और इससे सपा-बसपा गठबंधन को लाभ होगा। इसका कुछ लाभ कांग्रेस को भी मिल सकता है लेकिन उसे पाने की कांग्रेस की रणनीति और कार्यनीति क्या होगी यह स्पष्ट नहीं।

स्पष्ट है कि बिना रणनीति के बड़ी लड़ाइयां नहीं जीती जातीं और कार्यनीति विहीन रणनीति निराशा की ओर ले जाती है। कांग्रेस के पास अगर भाजपा को हराने की रणनीति है तो स्थानीय स्तर पर तालमेल और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की कार्यनीति नहीं है। जबकि सपा और बसपा के पास सिर्फ कार्यनीति है और उसे बड़ी जीत वा राष्ट्रीय आख्यान में बदलने की कोई रणनीति नहीं है।

 

दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति एक मिथक भी है और यथार्थ भी। मिथक इसलिए क्योंकि वह हिंदू धर्म के तीन बड़े तीर्थस्थलों का केंद्र है। काशी, मथुरा और अयोध्या के नाम पर खड़ी होने वाली राजनीति का केंद्र भी उत्तर प्रदेश ही रहेगा और सबसे बड़ा प्रदेश होने के नाते भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र भी वही बनता है। मुद्दा भले कश्मीर और पंजाब बने लेकिन निर्णायक जनादेश उत्तर प्रदेश से ही आता है। सोमनाथ की यात्रा खत्म अयोध्या में ही होती है और मां गंगा से मिलने मोदी बनारस ही जाते हैं। उत्तर प्रदेश के साथ एक और मिथक है और वह है देश की बादशाहत उसी के हाथ में होने की। वह जिसे चाहेगा वही देश का प्रधानमंत्री बनेगा या जिसे प्रधानमंत्री बनना हो उसे उसकी शरण में आना ही पड़ेगा। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश से ही चुनाव लड़ रहे हैं और मायावती और राहुल गांधी भी उसी प्रदेश से उम्मीद लगाए हैं। उत्तर प्रदेश यह भी सोचता है कि वह एक रहेगा तभी देश एक रहेगा और अगर वह बिखर गया तो देश बिखर जाएगा।

 

इन मिथकों का यथार्थ यह है कि यह प्रदेश 22 करोड़ आबादी का बड़ा बोझ लिए फिरता है। वहां प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है। उसके नागरिक हर प्रदेश में रोजगार के लिए भटकते हैं और वहां से कभी भगाए जाते हैं तो कभी निराश होकर लौटते हैं। विकास के तमाम पैमानों पर पिछड़े इस प्रदेश में अगर क्रांतिकारी ऊर्जा पर्याप्त है तो प्रतिक्रांतिकारी ऊर्जा भी अथाह है। गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की प्रतिक्रांतिकारी ऊर्जा तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक उसे उत्तर प्रदेश की मदद न मिले। इस प्रदेश ने अगर महात्मा गांधी की आलोचना करते हुए उनके सपनों की दिशा में गंभीर पहल की है और एक दलित महिला को चार बार प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया है। दूसरी विडंबना यह है कि यह प्रदेश लंबे समय से मंदिर मस्जिद, और पाखंड के कैद में है और उसने इक्कीसवीं सदी में किसी विद्वान या तकनीकी विशेषज्ञ की बजाय एक मठ के महंत को अपना प्रशासनिक प्रमुख बनाया है।

 

इसलिए उत्तर प्रदेश विभिन्न अतियों के बीच झूलता हुआ और कभी अपना संतुलन खोता हुआ देश को संतुलन प्रदान करता है तो कभी अपना संतुलन हासिल करते हुए देश को असंतुलित कर देता है। देखना है उत्तर प्रदेश मिथक में फंसकर देश को इस बार भी भरमाएगा या यथार्थ की जमीन पर उतर कर कोई नया संदेश देगा?