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बेईमानों के इस दौर में

युवा संवाद -  मार्च 2018 अंक में प्रकाशित

बड़ी पीड़ा के साथ कहना पड़ रहा है कि भारतीय समाज मूलतः झूठा और बेईमान है। इसके साथ यह कहने की जरूरत नहीं है कि वह जातिवादी, सांप्रदायिक और पाखंडी है क्योंकि वह तो जगजाहिर है। दिक्कत यह हुई है कि मरीज स्वयं डाक्टर बन बैठा है और वह अपने इन्हीं स्वभावों के आधार पर श्रेष्ठता प्रदर्शित कर रहा है। उसे भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता का ऐसा भूत चढ़ा है कि कुछ दिखाई ही नहीं पड़ रहा है। ऐसे में अगर पंजाब नेशनल बैंक जैसा घोटाला नहीं होगा तो क्या होगा। हैरानी की बात है कि एक तरफ सरकार बैंकों के पुनरुद्धार के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपए का पैकेज तैयार कर रही थी और उसके लिए 88,139 करोड़ रुपए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में प्रवाहित कर चुकी थी, इस बीच तकरीबन 12000 करोड़ रुपए का लेटर आफ अंडरस्टैंडिग घोटाला हो जाता है। इससे बैंकों के सेहतमंद होने की उम्मीद फिर धूमिल हो गई है। इस घोटाले को आभूषण डिजाइनर नीरव मोदी और उनके हीरा व्यापारी चाचा मेहुल चैकसी व उनकी कंपनी गीतांजलि जेम्स ने मिलकर अंजाम दिया है। सरकार का दावा है कि प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई ने छापे डालकर 5000 करोड़ रुपए की परिसंपत्तियां बरामद कर ली हैं और बाकी भी जल्दी ही बरामद कर लिया जाएगा। रही भगोड़े व्यापारियों को पकड़ने की बात तो उसकी कोई परंपरा रही नहीं है। ललित मोदी, विजय माल्या पहले से ही भगोड़ी परंपरा का सुख उठा रहे हैं तो नीरव मोदी और मेहुल चैकसी को क्यों दुखी किया जाए। नीरव मोदी रसूख वाले हैं और अगर न होते तो कैसे दावोस में भारत के प्रधानमंत्री के साथ फोटो खिंचवा लेते। आरोप है कि इससे पहले वे अपने इलाहाबाद के शो रूम के उद्घाटन में राहुल गांधी से भी वैभव की रोशनी में संगम स्नान करा चुके हैं। भारत की राजनीतिक प्रणाली उस शहंशाह फिल्म की तरह काम करने का दावा कर रही है जिसका हीरो दिन में रिश्वत लेता है और रात में जिरह बख्तर पहन कर अपराधियों को पकड़ता और दंड देता है। कई बार तो इन नेताओं के संवाद में वही प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है कि ‘‘नाम है शहंशाह और हम जहां खड़े होते हैं अदालत वहीं लग जाती है। हमारा इंसाफ करने का अपना तरीका है।’’

 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक यही स्टाइल अपनाए हुए हैं। इस सबके बावजूद हकीकत यह है कि ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल ने भ्रष्टाचार अनुभूति सूचकांक(करप्शन परसेप्शन इंडेक्स) में एशिया और प्रशांत के क्षेत्र में भारत को सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्र माना है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार पिछले पांच वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 61,260 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी हुई है। अगर इसमें पीएसबी के 13,000 करोड़ रुपए के घोटालों को जोड़ लिया जाए तो यह आंकड़ा 73,000 करोड़ रुपए तक आता है। लेकिन लेटर आफ अंडरस्टैंडिंग के माध्यम से होने वाला यह घोटाला सिर्फ पीएनबी तक ही नहीं व्याप्त है। उसके आधार पर अन्य बैंकों ने भी कर्ज दिया है। वह सब भी डूबने की कगार पर है। इस घोटाले के 17 माह पहले स्विफ्ट (सोसायटी फार वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन्स) प्रणाली के माध्यम से यूनियन बैंक आफ इंडिया को 17 करोड़ डालरका चूना लगते लगते रोक लिया गया। यह काम हैकिंग के माध्यम से किया गया और यूनियन बैंक आफ इंडिया के दो अमेरिकी बैंकों में नास्त्रो अकाउंट थे, जहां से रिजर्व बैंक और यूनियन बैंक ने मिलकर अपना धन वापस हासिल किया गया।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने अगला कार्यकाल न मिलने से पहले एक इंटरव्यू में कहा था कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली के बही खातों में बहुत गड़बड़ी है। इसलिए ब्याज दरें कम करने या बैंकों के पुनरुद्धार से पहले उस काम को करने की जरूरत है। अगर उन्हें अगला कार्यकाल मिलता तो उनके एजेंडा में यह

काम सबसे ऊपर था। उन्हें दूसरा कार्यकाल नहीं मिला जिसके पीछे एक वजह स्वदेशी लाबी का दबाव है तो दूसरी वजह उन अधिकारियों, बैंकरों और नेताओं की गुटबाजी भी हो सकती है जिनका निहित स्वार्थ घोटालों में शामिल है। घोटालों को ठीक करने और भारत को एक बार फिर सोने की चिड़िया बनाने का वादा करके सत्ता में आई भाजपा ने संस्थाओं को दरकिनार करके सब कुछ इतना निजी बना दिया है कि स्थिति शहंशाह वाली ही आ गई है। भारत के 20 सार्वजनिक बैंकों में वाचडाग (निगरानी इकाइयों) के पद पिछले छह महीने से खाली पड़े हैं। यूपीए सरकार ने लंबे संघर्ष के दबाव में लोकपाल का विधेयक पारित किया था लेकिन चार साल बीत जाने के बावजूद एनडीए सरकार ने उसे गठित करने का कोई इरादा नहीं जताया है। यह एक विडंबना है कि इसी दौर में उदारीकरण के कट्टरपंथी सार्वजनिक बैंकों के निजीकरण का एजेंडा लेकर सामने आ गए हैं। वे बैंकिंग प्रणाली को 1969 से पहले वाले युग में ले जाना चाहते हैं जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का निजीकरण किया था। उनका कहना है कि निजी क्षेत्र के बैंकों में गड़बड़ियां नहीं होतीं और उनकी नियामक प्रक्रिया ज्यादा चुस्त है। यह दलील कुछ ऐसी हुई जैसे कि मौजूदा घोटाले में सारे सरकारी लोग ही थे और नीरव मोदी और मेहुल चैकसी की कोई भूमिका ही नहीं थी।जब देश में 70 प्रतिशत बैंकिंग कारोबार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के माध्यम से होता है तो गड़बड़ी भी वहीं होने की आशंका रहेगी। इसलिए निजी और सार्वजनिक की बहस उतनी सार्थक नहीं है जितनी बेईमानी और झूठ से निजात पाने की। लोकतंत्र में नायकत्व की भूमिका होती है लेकिन महानायकत्व खतरनाक होता है यह चेतावनी डाक्टर आंबेडकर ने भी दी थी। उसके कारण न सिर्फ जुमलेबाजी को बढ़ावा मिलता है बल्कि संस्थाओं की भूमिका गौण हो जाती है। घोटालों के इस दौर में बेईमानी ईमानदारी का चोला पहनकर आती है और पहले से ज्यादा झटका दे जाती है। यह जागने और जगाने का वक्त है। सवाल सिर्फ रात के अंधेरे में लुटने का नहीं दिन के उजाले में ठगे जाने का भी है।