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जंगल के मालिकों के घर डाका

युवा संवाद -मार्च 2019 अंक में प्रकाशित

ऐसा पहली बार हुआ कि देश की सर्वोच्च अदालत ने एक साथ दस लाख से ज्यादा आदिवासियों को उनकी रिहाइशों से बेदखल करने और जंगल खाली करवाने के आदेश सरकारों को दिए हैं। यह अभूतपूर्व फैसला है, जिसे जस्टिस अरुण मिश्रा, नवीन सिन्हा और

इंदिरा बनर्जी की खंडपीठ ने कुछ स्वयंसेवी संगठनों द्वारा वनाधिकार अधिनियम 2006 की वैधता को चुनौती देने वाली दायर एक याचिका पर सुनाई करते हुए सुनाया है। वनाधिकार अधिनियम को इस उद्देश्य से पारित किया गया था ताकि वनवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक नाइंसाफी को दुरुस्त किया जा सके। इस कानून में जंगल के जमीनों पर वनवासियों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता दी गई थी जिसे वे पीढ़ियों से अपनी आजीविका के लिए इस्तेमाल करते आ रहे थे। आदेश की मुख्य बातें हैं-

 

हालांकि जमीन पर इस कानून के क्रियान्वयन में सक्रियता से काम कर रहे जन संगठनों ने इस पर गंभीर आपत्ति की है। सम्मान के साथ जीने के अधिकार अभियान (केंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी) ने अपने वक्तव्य में कहा है कि “तथ्यात्मक रूप से कई आधिकारिक और स्वतंत्र रिपोर्ट्स में यह माना गया है कि बड़े पैमाने पर दावों को गलत ढंग से अमान्य/खारिज किया गया है और वन विभाग के अधिकारियों की विशेष रूप से जो भूमिका रही है वो लोगों के हक-अधिकारों को मान्यता न दिये जाने की दिशा में ही रही है।” केंद्र व राज्य सरकारों दोनों ने कई बार यह माना भी है लेकिन केंद्र सरकार ने कोर्ट के संज्ञान में इस बुनियादी तथ्य को नहीं रखा। इस कानून में जिन दावेदारों के दावे खारिज हुए हैं उनकी बेदखली को लेकर कोई प्रावधान भी नहीं है बल्कि इसी कानून के अनुच्छेद 4(5) में बेदखली को तब तक के लिए विशेष रूप से रोका गया है जब तक पूरे क्षेत्र में इस कानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो जाती। यह आदेश वन अधिकारियों को एक ऐसा हथियार मुहैया करा सकता है जिससे वो देश भर में लाखों की तादाद में जंगलों में रह रहे लोगों पर हमला कर सकते हैं।

 

खैर, इस आदेश ने एक बार फिर जंगल, जंगल की जमीन और जंगल में मौजूद संसाधनों पर नैसर्गिक दावेदारी और पारिस्थितिकी, पर्यावरण, जैव विविधता संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण व मानव समुदाय के नैसर्गिक और अन्योन्याश्रित संबंधों को लेकर एक देशव्यापी बहस तो छेड़ ही दी है। यह ठीक 2002-04 के दौरान की स्थिति की पुनरावृत्ति है जब इसी सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार वन भूमि को परिभाषित किया था और जिस वजह से देश का बड़ा भू-भाग रातों-रात जंगल में तब्दील हो गया था और स्वाभाविक रूप से वह देश के सबसे बड़े जमींदार यानी वन-विभाग की मिल्कियत बन गया था। इसी सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार देश में सबसे पुराने समुदाय, जो सदियों से एक खास भू-भाग में रहते आए थे, अतिक्रमणकारी मान लिए गए थे और जिन्हें तत्काल प्रभाव से जंगलों से बेदखल करने की मुहिम तमाम राज्यों के वन विभागों ने पूरी सक्रियता से चलाई थी।

 

यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि उस समय भी केंद्र में एनडीए की सरकार थी और सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक ऐसी ही भूमिका अपनायी थी। यह ‘इत्तेफाक’ से कहीं ज्यादा ‘राजनीति’ का मामला है कि ऐसा क्या हो जाता है कि आदिवासियों और वंचितों के विरोध में जब केंद्र में सरकार बनती है तब न्याय के सबसे बड़े प्रतिष्ठान भी ठीक वंचित-विरोधी रवैये का मुजाहिरा करते हैं? जंगल और उससे जुड़े मुद्दे बिलकुल जंगल जैसे ही पुराने हैं और विविध हैं। इसलिए जब ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को दुरुस्त करने के लिए देश की सर्वोच्च संस्था संसद एक प्रगतिशील कानून बनाती है तो वह भी केवल ऐतिहासिक रूप से हुए अन्यायों का हवाला देकर आगे बढ़ जाती है उनका विस्तार से जिक्र नहीं करती और उन अन्यायों के लिए किसी संस्था की जवाबदेही तय नहीं करती।

 

जमीन और जंगल के संसाधनों पर सामुदायिक अधिकारों का मुद्दा मूलतः कानूनी मुद्दा है और यह अनिवार्य तौर पर देश का प्रमुख राजनैतिक मुद्दा है। इस आदेश में सत्तासीन राजनैतिक दल और कानून की सर्वोच्च संस्था के गठजोड़ ने लाखों आदिवासियों की जिंदगियों  को गंभीर रूप से प्रभावित किया है और इन समुदायों के संवैधानिक हितों के लिए संघर्षरत जन संगठनों और कानूनी तौर पर सक्रिय पेशेवरों को निराश किया है। वर्षों से चल रहे संघर्ष को एक बार फिर उसी मुहाने पर ला खड़ा कर दिया गया है जहां इस कानून को बनाने के लिए देश भर के आदिवासी व परंपरागत रूप से जंगलों में रह रहे समुदायों ने दिल्ली कूच किया था। इस  एक तर्कहीन आदेश ने हालांकि राजनीति में वंचितों में हक में खड़े होने और खड़े दिखने के अवसर भी देश के राजनैतिक दलों को दिये हैं। गौरतलब है कि जहां केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले में चुप्पी का चयन किया और पुलवामा कांड से पैदा हुई छद्म राष्ट्रवाद की ओट लेकर इस पूरे मामले से किनारा किया वहीं विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पूरे मामले पर अपनी नजरें बनाई रखी और समय समय पर विभिन्न राज्यों में अपनी सरकारों को सकारात्मक हस्तक्षेप करने की समझाइश दी और समानान्तर रूप से केंद्र सरकार की आलोचना भी की।