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जेएनयू क्या देशद्रोहियों का अड्डा है?

युवा संवाद - अप्रैल 2016 अंक में प्रकाशित

जेएनयू को लेकर चल रही बहस में एक सवाल शिक्षा का आया। बहुत सारे लोगों ने पूछा कि यह कौन सी पढ़ाई है जो जेएनयू के छात्र छह-आठ साल तक पढ़ते रहते हैं और तीस की उम्र तक पहुंच जाते हैं। यही नहीं, यह सवाल भी उठा कि जनता के पैसे से क्या जेएनयू के छात्रों को इस बौद्धिक विलास की छूट दी जा सकती है?

 

यह सवाल दरअसल हमारे समाज में शिक्षा को लेकर बने नजरिए पर एक चिंताजनक टिप्पणी करता है। मैकाले ने भारत में पढ़ाई-लिखाई का मकसद क्लर्क पैदा करना बताया था। मैकाले के जाने के बाद भी पढ़ाई-लिखाई का मूल लक्ष्य वही बना रहा। फिर भी गुलाम या आजाद भारत में शिक्षा की नई हवा ने अपने ढंग से एक स्वायत्त और स्वतंत्रचेता समाज बनाया।भारत की आजादी की लड़ाई इसी शैक्षणिक चेतना से पैदा हुई। उस समय राष्ट्रवाद ने साम्राज्यवाद से एक तीखी लड़ाई लड़ी। यह वह दौर था जब नेहरू या गांधी से किसी ने नहीं पूछा कि बैरिस्टरी की पढ़ाई करने के बाद वे उस पर मट्ठा डाल कर आजादी की लड़ाई में क्यों कूद पड़े। सुभाष चंद्र बोस से किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि आइसीएस छोड़कर वे कांग्रेस और आजाद हिंद फौज बनाने क्यों निकल पड़े। क्योंकि उस समय बड़े पैमाने पर अनपढ़ रहे समाज में भी यह समझ थी कि पढ़ाई-लिखाई का मकसद सिर्फ पैसा कमाना नहीं है, देश और समाज के काम आना भी है।

 

इसके उलट बहुत सारे पढ़े-लिखे लोग ऐसे भी थे जो अपनी बैरिस्टरी या अफसरी से चिपके रहे, आजादी की लड़ाई में पूरी वफादारी से अंग्रेजों के साथ खड़े रहे और गांधी-नेहरू से लेकर भगत सिंह-चंद्रशेखर आजाद तक को देशद्रोही मानते रहे। ये वे लोग थे जिनके लिए पढ़ाई-लिखाई पैसा कमाने का जरिया थी। यही वे लोग भी थे जिन्होंने आजादी के बाद हिंदुस्तान को अलग-अलग आर्थिक हैसियत के स्कूलों की वह संस्कृति दी जिसमें शिक्षा भी सामाजिक-आर्थिक भेदभाव को बनाए-बचाए रखने का उपक्रम हो गई। पढ़ाई अब न बेहतर मनुष्य बनने का जरिया है, न बौद्धिकता और तर्कशीलता के माध्यम से चेतना अर्जित करने का, न अपने समाज या जीवन की समझ पैदा करने का। वह बस पैसा पैदा करने का रास्ता है जिस पर ज्ञान की दुकान चल रही है और जिसमें दो या चार साल की कारोबारी पढ़ाई के बाद कैंपस से लड़के सीधे मोटे पैकेज पर उठाए जा रहे हैं और औद्योगिक घरानों के परिसर में झोंके जा रहे हैं। जाहिर है, जब शिक्षा ऐसे चोखे कारोबार में बदल जाए तो उसमें वे लोग ही ज्यादा होते हैं जिनका शिक्षा से नहीं, पैसे से वास्ता होता है। यह इत्तेफाक भर नहीं है कि इन दिनों भारत में स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक में निजी निवेश काफी बढ़ा है और इसमें भी ज्यादातर उस संदिग्ध पूंजी के जरिए आया है जिसके पीछे प्रॉपर्टी डीलिंग से लेकर बिल्डिंग इंडस्ट्री और बहुत सारे दूसरे ऐसे ही धंधे हैं। इसका एक नतीजा यह हुआ है कि शिक्षा बेहद महंगी हो गई है और अक्सर कर्ज लेकर हासिल की जाती है जिसे बाद में चुकाना पड़ता है। शिक्षा को ऐसे कारोबार में बदल देने वाले लोग ही यह सवाल पूछते हैं कि जेएनयू में पढ़ने वाले इतनी पढ़ाई क्यों करते हैं, कहीं नौकरी क्यों नहीं करते और राजनीति क्यों करते हैं?

इत्तेफाक से यही सवाल रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद पूछा गया जिसके पीछे यह इशारा पढ़ना मुश्किल नहीं था कि एक मेहनती दलित बच्चे ने राजनीति के चक्कर में आकर अपना करिअर बरबाद किया और अंतत जान दे दी। हमारी कारोबारी शिक्षा से निकली कमाऊ पीढ़ी के किसी नौजवान के सामने नैतिकता के संकट आम तौर पर नहीं आते हैं। वह शादी में दहेज लेने से नहीं हिचकता, सरकारी कंपनियों में होता है तो घूस लेने में नहीं हिचकता, निजी कंपनियों में होता है तो घूस देने में नहीं हिचकता, इन निजी कंपनियों में योग्यता के नाम पर वह अपनों को भरता है और कार्यकुशलता की कमी की भरपाई वह ड्यूटी के घंटों को फैला कर, देर तक काम करके पूरा करता है। किसी नैतिक या सामाजिक या राष्ट्रीय दायित्व की भरपाई वह आसान किस्म की देशभक्ति से करता है - भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच में झंडे फहराकर, कश्मीर या पूर्वोत्तर के पक्ष में या दलितों और आदिवासियों के पक्ष में बोलने वालों को गाली देकर, आरक्षण के विरोध में योग्यता का परचम लहराते हुए और जेएनयू में पढ़ने वालों को इस बात के लिए लताड़ते हुए कि वे सरकारी पैसे पर पढ़कर भी देशविरोधी नारे लगाते हैं। यह अलग बात है कि पहला मौका मिलते ही वह देश छोड़कर विदेश में जा बसता है।

 

लेकिन पढाई-लिखाई को लेकर घोर उपयोगितावादी और कारोबारी नजरिया रखने वाले लोगों की यह जमात यह नहीं देख रही कि नए भारत के चमचमाते निजी संस्थानों के बाहर जो केंद्रीय या राज्यों के विश्वविद्यालयों के सरकारी और धूल भरे परिसर हैं, वहां अपने अभावों का मारा हिंदुस्तान उन सामाजिक तकनीकों को समझने का यत्न कर रहा है जिनके जरिए कुछ लोग उसके संसाधनों पर कब्जा करके बैठे हुए हैं और उस पर हुकूमत करते हैं। सिर्फ जेएनयू या हैदराबाद विश्वविद्यालय में ही नहीं, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी - हर जगह इस अराजक असंतोष को पहचाना जा सकता है।

 

दुर्भाग्य से हमारे विश्वविद्यालयों को पहले ही पढ़ाई-लिखाई, विचार-विमर्श के केंद्रों के तौर पर बचा नहीं रहने दिया गया है, इसलिए यह असंतोष एक तरह की अराजकता में फूटता है और अंततः उन्हीं लोगों के काम आ जाता है जिनकी वजह से ये पैदा हुआ है। इसलिए अपने मौजूदा हाल में ये विश्वविद्यालय सत्ता प्रतिष्ठानों को डराते नहीं। उन्हें मालूम है कि इन छात्रों को भी देशभक्ति के नारों से बरगलाना आसान है। सबको नहीं तो कुछ को। कभी-कभी संकट तब पैदा होता है जब हैदराबाद यूनिवर्सिटी में कोई रोहित वेमुला खुदकुशी कर सरकारी तंत्र के रवैये की कलई खोल देता है या फिर किसी अन्य विश्वविद्यालय के भीतर से व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाने वाले छात्र उठ खड़े होते हैं। क्योंकि तब सरकारों को यह वास्तविक डर घेरता है कि यह संक्रामक न हो उठे और दूसरे विश्वविद्यालयों में भी किसी वायरस की तरह न पसर जाए। इसलिए कोशिश उस माहौल को नष्ट कर देने की है जिसमें बौद्धिकता और विकेकशील बहसों से भरा-पूरा कोई परिसर विकसित हो सके और बहुत असुविधाजनक सवालों से हमारी मुठभेड़ कराने के लिए हमें मजबूर कर सके।

 

संपादकीय