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चुनाव में धर्म और जाति के इस्तेमाल की उलझनें

युवा संवाद -  मार्च 2017 अंक में प्रकाशित

मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर ने रिटायर होने से ठीक पहले चुनाव सुधार को दिशा देते हुए एक ऐसा फैसला दिया है जिस पर लंबे समय तक बहस होगी और जिसे आदर्श मानते हुए भी लागू करना बेहद कठिन होगा। जन प्रतिनिधित्व की धारा 123(3) के तहत सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि अगर उम्मीदवार या उसके एजेंट ने चुनाव में धर्म, जाति, भाषा और पंथ का इस्तेमाल वोट पाने के लिए किया तो उसे अवैध घोषित किया जा सकता है, भारतीय लोकतंत्र का एक आदर्श है। राजनीतिक दलों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि हमारा लोकतंत्र व्यापक दृष्टिकोण वाला बने और भारत की राष्ट्रीयता संकीर्ण और विघटनकारी न बने। मतलब एक धर्मनिरपेक्ष राजनीति विकसित हो तो जनता के आर्थिक विकास और शैक्षणिक तरक्की पर ध्यान केंद्रित करे, न कि उसे मंदिर, मस्जिद, भाषा और जाति के आधार पर विभाजित करके लड़ाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारा समाज वैसी स्थिति में है जहां पर इस आदेश को लागू कर पाना संभव होगा? क्योंकि भारतीय समाज धार्मिक और जातिगत चेतना में जिस गहराई में जीता है क्या उसे चुनाव के दौरान पूरी तरह से निकाल पाना संभव होगा? फिर अगर चुनाव के दौरान उस चेतना से मुक्त हो पाना संभव नहीं होगा तो यह दावा कैसे किया जा सकेगा कि संबंधित उम्मीदवार जाति और धर्म के आधार पर वोट मांग रहा है या नहीं मांग रहा है?

 

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दरअसल संविधान के नीति निदेशक तत्वों और मौलिक अधिकारों में अंतर्निहित अंतर्विरोध को प्रकट करता है। नीति निदेशक तत्व जहां धर्मनिरपेक्ष और आर्थिक लोकतंत्र वाले समाज की स्थापना का आदर्श सामने रखते हैं वहीं मौलिक अधिकार व्यक्ति और समूह को धर्म, संस्कृति, भाषा और पंथ में विश्वास की आजादी देते हैं। संविधान सभा में धर्म और संस्कृति को मौलिक अधिकारों की सूची में शामिल करते समय भी यह सवाल उठा था कि अगर यह अधिकार दिए गए तो राज्य को सामाजिक परिवर्तन के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा। अगर सामाजिक सुधार के लिए कोई कानून बनाया गया तो उससे व्यक्ति या समुदाय के मौलिक अधिकारों का हनन होगा और वह उसे चुनौती दे सकता है। आरक्षण और छुआछूत उन्मूलन, जमींदारी उन्मूलन के प्रावधानों को इस आधार पर चुनौती दी भी जाती रही है। कभी कानूनी रूप से तो कभी गैरकानूनी रूप से।

 

 

वास्तव में राजनीति और धर्म व राजनीति और जाति का चुनाव में धर्म और जाति के इस्तेमाल की उलझनें दुनिया के सभी समाजों में एक जटिल रिश्ता होता है। लेकिन एक लोकतांत्रिक और प्राचीन देश होने के नाते भारत में वह रिश्ता कुछ ज्यादा ही जटिल है। जाति के व्यवस्थागत प्रश्न में सबसे हालिया बहस जाति आधारित जनगणना को मान सकते हैं जिसमें देश की संसद में ये लोग हावी हो गए थे जो मानते थे कि जनगणना जाति के आधार पर होनी चाहिए। रोचक तथ्य यह है कि 2011 में हुई जाति आधारित जनगणना के आंकड़े आ चुके हैं लेकिन सरकार उसे जारी नहीं कर रही है।राजनीतिशास्त्रियों और राजनेताओं का एक तबका मानता रहा है कि उससे जातिवाद बढ़ेगा जबकि दूसरा तबका मानता है कि उसके स्पष्ट हो जाने से समाज में सरकार और दूसरी संस्थाओं के सार्थक् हस्तक्षेप बनेंगे और उससे जातियों का राजनीतिकरण होने के साथ जाति व्यवस्था को तोड़ने में मदद मिलेगी।

 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महात्मा गांधी, डाॅ. बाबा साहब अंबेडकर और डा. राम मनोहर लोहिया जैसे सभी चिंतक श्रेणी के राजनेताओं ने धर्म और जाति के उपकरणों का इस्तेमाल समाज को बदलने और बराबरी लाने के लिए किया है। आज की व्यावहारिक राजनीति अपना बचाव भी उन्हीं आदर्शों के आधार पर ही करती है। अगर जातियां समाज में संघनित वर्ग हैं तो धर्म के बारे में डाॅ. लोहिया ने कहा है कि धर्म दीर्घकालिक राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म, धर्म और राजनीति के रचनात्मक रिश्ते को स्पष्ट करते हुए डाॅ. लोहिया कहते हैं: ‘धर्म और राजनीति के अविवेकी मिलन से दोनों भ्रष्ट होते हैं। किसी एक धर्म को किसी एक राजनीति से कभी नहीं मिलाना चाहिए। इसी से धार्मिक कट्टरता जन्म लेती है। धर्म और राजनीति को अलग रखने का सबसे बड़ा मतलब यही है कि सांप्रदायिक मिलन और कट्टरता से बचें। इतना ध्यान रखते हुए भी जरूरी है कि धर्म और राजनीति एक दूसर ेसे संपर्क न तोड़ें क्योंकि धर्म का काम है अच्छाई करना और अच्छाई की तारीफ करना, जबकि राजनीति है बुराई से लड़ना और अच्छाई करना। इसमें ज्यादा फर्क करने पर दोनों एक दूसरे का साथ छोड़ देते हैं। इसलिए धर्म निष्प्राण हो जाता है और राजनीति कलही हो जाती है।’

 

राजनीति और धर्म के रिश्ते पर भारतीय संदर्भ की गई यह टिप्पणी व्यापक विमर्श की मांग करती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि वह फैसला विभिन्न दलों पर किस तरह से लागू होता है और हमारी राजनीति की बहसों का रुख क्या होता है।