www.yuvasamvad.org

CURRENT ISSUE | ARCHIVE | SUBSCRIBE | ADVERTISE | CONTACT

सम्पादकीय एवं प्रबन्ध कार्यालय

167 ए/जी.एच-2

पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063

फोन - + 91- 7303608800

ई-मेल – ysamvad[~at] gmail.com

मुख्य पृष्ठ  *  पिछले संस्करण  *  परिचय  *  संपादक की पसंद

सदस्यता लें  *  आपके सुझाव

मुख्य पृष्ठ  *  पिछले संस्करण  *  परिचय  *  संपादक की पसंद  *  सदस्यता लें  *  आपके सुझाव

नास्तिकता राजनीति तो नहीं है

युवा संवाद - नवंबर 2016 अंक में प्रकाशित

नास्तिकता एक गंभीर विषय है। ईश्वर के होने और न होने के प्रश्न से बहुत आगे का विषय। पिछले दो सौ साल में इस पर बहुत बातें हुई हैं। ईश्वर की मौजूदगी को नकारने वाला तत्व नास्तिकता में इतना बचकाना है कि आज इस पर बात तक नहीं होती। बात ज्यादा जटिल आयामों पर होती है। बचकाना नास्तिकों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि वे ईश्वर के बारे में सबसे ज्यादा बात करते हैं। इसीलिए जब-जब नास्तिकों पर संकट आता है, जैसा कि वृंदावन में हुआ है, तब-तब ईश्वर को याद करना जरूरी हो जाता है और खासकर उन लोगों को, जिन्होंने ईश्वर और धर्म के बारे में कुछ कायदे की बातें

कही हैं।

 

ऐसी ही एक बात 1843 में कार्ल माक्र्स ने की थी ‘ऑन दि जूइश क्वेश्चन’ नामक किताब में, जिसे मैं यहां प्रसंगवश उद्धृत कर रहा हूं! माक्र्स ने लिखा था -

 

‘हमारे लिए धर्म बुनियादी नहीं है, बल्कि वह दुनियावी सीमाओं को दर्शाने वाली एक परिघटना है। इसी कारण से हम मुक्त नागरिकों की धार्मिक गुलामी को उनकी दुनियावी गुलामी के सवाल के साथ जोड़कर समझाते हैं। हम इस बात को मानते हैं कि वे जैसे ही अपनी दुनियावी सीमाओं से मुक्त होंगे, अपनी धार्मिक सीमाओं का भी दमन कर देंगे। हम लोग जमीनी सवालों को धार्मिक सवालों में नहीं बदलते। हम धार्मिक सवालों को जमीनी सवालों में बदलने का काम करते हैं।’

 

नास्तिकता अपने आप में राजनीति नहीं है, क्योंकि बकौल माक्र्स- ‘हमारे लिए धर्म बुनियादी नहीं है, बल्कि वह दुनियावी सीमाओं को दर्शाने वाली एक परिघटना है।’ हमारा काम धार्मिक सवाल को जमीनी सवाल में बदलना है, न कि धार्मिक सवाल को धार्मिकता के दूसरे व परस्पर विरोधी छोर पर खड़े होकर उकसावे में बदलना है। हां, ऐसा करना तात्कालिक राजनीतिक टैक्टि का हिस्सा जरूर हो सकता है, बशर्ते इससे कुछ हासिल होने की उम्मीद हो।

 

वृंदावन स्वामी के आश्रम में क्या कोई राजनीतिक टैक्टिक्स खेली जा रही थी? कतई नहीं। माना, कि हमने ऐसा उत्साह में आकर कर भी दिया, धार्मिकता के दूसरे छोर पर खुद को घोषित कर के एकजुट होने की एक कोशिश कर डाली, तो उसका भी कोई उद्देश्य जरूर रहा होगा। ‘ऐंवेइ मस्ती’ उद्देश्य तो नहीं हो सकता। आयोजन में जाने वालों के विरोध का लहजा ही विरोध को अश्लील बना रहा है क्योंकि उनका प्रस्थावन बिंदु ही अश्लील था। गोकि हमला गलत है, नहीं होना चाहिए था, यह बात जरूर कही जानी चाहिए, लेकिन सही तर्क के साथ। ऐसे नहीं होगा कि आप नास्तिकता का तर्क लेकर जुटेंगे, लेकिन बिखरा दिए जाने पर जनवाद का झंडा उठा लेंगे।

एक अहम दलील यह दी जा रही है कि इस देश में आस्तिकों को हर तरह की छूट है लेकिन नास्तिक शांति से चर्चा भी नहीं कर सकते। अपनी डॉक्टरल थीसिस में माक्र्स साफ शब्दों में कहते हैं कि ‘किसी तर्कप्रधान देश में ईश्वर के अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं होगा’। एक बार हमें फिर से माक्र्स को याद करना होगा -

 

‘एक ऐसे देश में कागज की मुद्रा लेकर जाएं जहां इसके बारे में लोग नहीं जानते हों, तो हर कोई आपके इस प्रतीकात्मक प्रदर्शन पर हंसेगा। आप अपने ईश्वर को लेकर उन देशों में जाएं जहां दूसरे ईश्वरों की पूजा की जाती हो। आपको कह दिया जाएगा कि आप फंतासी व अमूर्त बात कह रहे हैं। एक देश के ईश्वर की जो स्थिति दूसरे देश में होतीहै, वही स्थिति तर्कप्रधान एक देश में ईश्वर की होती है। तर्क एक ऐसा दायरा है जहां ईश्वर का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।’

 

कुछ लोग चार्वाक आदि का उदाहरण दे रहे हैं कि वे भी तो इसी धरती की पैदाइश थे। जो स्थिति चार्वाक की उस वक्त थीए वही स्थिति आज चार्वाक का नाम जानने वाले मुट्ठी भर लोगों की इस वक्त है इस देश में। प्रसंग में दयानंद सरस्वती का भी नाम आ रहा है कि उन्होंने पाखंड के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। इसका 'ऐंवेइ मस्ती' से क्यां लेना.देनाघ् क्या वृंदावन जाने वाले किसी पाखण्ड को चुनौती देने गए थेघ् अपने गलत तर्क के चलते कल को आप अंधविश्वास के खिलाफ आजीवन लड़ने वाले और जान देने वाले शहीद कामरेड पानसरे जैसे योद्धा से वृंदावन जाने वालों की तुलना कर डालेंगेघ् सब धान बाईस पसेरी कर देंगेघ् केवल इसलिए क्योंकि आप नास्तिकता को सही तरीके से बरत नहीं पाए?

 

आस्तिकता गलत दिशा में चली गई हो तो उससे बहुत फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मामला अफीम की खुराक का ही होता है। नास्तिकता गलत लीक पर चली गई तो बहुत नुकसान हो जाएगा। इस दुनिया को और इस दुनिया के असंख्य भगवानों को नास्तिकों ने ही बचाए रखा है अपनी वाजिब दलीलों से, जिनके सहारे असंख्य गरीब-गुरबा आबादी अपनी फंतासियों और कल्पनाओं को अमूर्तन में जीती है, बची रहती है। नास्तिकता ने गलत तर्क चुना तो सबसे पहले अधिसंख्य आस्तिकों का नुकसान होगा, वो भी सबसे कमजोर आस्तिक का।